असंवैधानिक और पीड़िता की गरिमा के खिलाफ है ‘टू-फिंगर टेस्ट’: हाईकोर्ट

two-finger test
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गुजरात हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि, टू-फिंगर टेस्ट(Two-finger test), पीड़िता की निजता, शारीरिक और मानसिक निष्ठा और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है। यह बलात्कार के मामले में पीड़िता के कौमार्य/सहमति के निर्धारण के लिए किया जाने वाला टू-फिंगर टेस्ट ‘पुरातन और अप्रचलित’ तरीका है और असंवैधानिक है।

हाईकोर्ट ने कहा कि “हमारा प्रयास है कि ट्रायल कोर्ट के साथ-साथ चिकित्सा जगत को याद दिलाया जाए कि ‘टू-फिंगर टेस्ट’ असंवैधानिक है, क्योंकि यह बलात्कार पीड़िता के निजता, शारीरिक और मानसिक निष्ठा और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन करता है। यदि कोर्ट के समक्ष ऐसा कोई भी मेडिकल सर्टिफिकेट आए, जिसमें इस टेस्ट का संदर्भ हो तो उसे तुरंत संज्ञान लेना चा‌हिए और मामले में जरूरी कार्रवाई करनी चाहिए।”

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आईये जानतें हैं ये ‘टू-फिंगर टेस्ट’ क्या होता है-

टू फिंगर टेस्ट किसी महिला के साथ रेप के बाद मेडिकल परीक्षण के नाम पर दूसरी बार किया जाने वाला रेप है। यह टेस्ट बलात्कार से भी ज्यादा दर्दनाक है, जिसमे शारीरिक उत्पीड़न के साथ साथ मानसिक उत्पीड़न भी होता है।

सरल शब्दों में इसे वर्जिनिटी टेस्ट कहते है इस प्रक्रिया से यह निर्धारित किया जाता है कि कोई महिला कुंवारी है या नहीं, यानी कि क्या उसने कभी भी संभोग किया है या नहीं।

‘टू-फिंगर टेस्ट’ कैसे किया जाता है-

सामान्य तौर पर इस परीक्षण में महिला की योनिच्छद / hymen का परीक्षण किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि, महिला के योनिद्वार की झिल्ली केवल संभोग के परिणामस्वरूप ही फट सकती है। इस परीक्षण को सामान्यतः दो उँगली परीक्षण कहा जाता है।

इस प्रक्रिया में बलात्कार पीड़ित महिला की वजाइना के लचीलेपन का परीक्षण किया जाता है जिसमें अंदर प्रवेश कराई गयी गई उंगलियों की संख्या के आधार पर चिकित्सक अपना निष्कर्ष निकलता है कि पीड़ित महिला पहले से सक्रिय सेक्स लाइफ’ में है या नहीं।

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चूँकि डॉक्टर यह मानते हैं कि महिला की मर्जी के खिलाफ किए गए सेक्स के कारण ही हाइमन जल्दी टूटता है इसलिए कुंवारी बलात्कार पीड़ित लड़कियों के साथ हुयी घटना को प्रमाणित करने में यह परिक्षण सहायक होता है।

लेकिन यह एक विवादास्पद जाँच है। एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा इसे अपमानजनक और मानव अधिकारों का उल्लंघन माना गया है और कई देशों में यह अवैध घोषित है।

कोर्ट का इस पर क्या कहना है-

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस भार्गव डी करिया की बेंच ने कहा की, टू फिंगर टेस्ट भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 146 के प्रत्यक्ष विरोध में है, जिसका कहना है कि “बलात्कार या बलात्कार के प्रयास के मामले के पीड़िता के सामान्य चरित्र पर सवाल उठाने की अनुमति नहीं होगी।”

यौन उत्पीड़न के मामले में यह टेस्ट खुद परीक्षण के सबसे अवैज्ञानिक तरीकों में से एक है और इसका कोई फॉरेंसिक महत्व नहीं है। यौन उत्पीड़न से पहले शारी‌रिक संबंध में प‌ीड़िता के शामिल होने का इस बात से कोई लेनादेना नहीं है कि उसने यौन उत्पीड़न के मामले में सहमति दी थी या नहीं। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 155, बलात्कार पीड़ित की विश्वसनीयता को इस आधार संदेह करने की अनुमति नहीं देती है कि वह समान्यतया अनैतिक चरित्र की है।”

हाईकोर्ट ने, इंटरनेशनल कोवनंट ऑन इकोनॉमिक, सोशल, कल्चरल, राइट्स, 1966 और यूनाईटेड नेशंस ड‌िक्लेयरेशन ऑफ बेसिक प्रिंस‌िपल्स ऑफ जस्टिस फॉर विक्टिम्स ऑफ क्राइम एंड एब्यूज़ ऑफ पॉवर 1985 के दाय‌ित्वों और संवैधानिक दा‌‌यित्वों की याद द‌िलाते हुए कहा कि-

“दुष्कर्म पीड़िता कानूनी उपचार की हकदार है, जिससे उन्हें मानसिक पीड़ा न हो, शारीरिक, मानसिक निष्ठा और गरिमा का उल्लंघन न हो। चिकित्सा प्रक्रियाओं ऐसी हों, जिनसे सहमति के अधिकार का सम्मान किया जाए। ऐसी चिकित्सा प्रक्रियाएं न की जाएं, जो क्रूर, अमानवीय और अपमानजनक हों। राज्य का दायित्व है कि वह यौन हिंसा से बचे लोगों को ऐसी सेवाएं उपलब्ध कराए। उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उचित उपाय किए जाएं और उनकी गोपनीयता में कोई मनमाना या गैरकानूनी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।

2013 में, सुप्रीम कोर्ट ने लीलू @ राजेश बनाम हरियाणा राज्य और अन्य के मामले में कहा था कि ‘टू-फिंगर टेस्ट’ महिला के निजता और सम्मान के अधिकार का उल्लंघन है।

दिसंबर 2019 में भी सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराध के मामलों में टू-फिंगर टेस्ट के उपयोग बंद करने को कहा था और राज्य सरकारों रिपोर्ट मांगी थी कि टू-फिंगर टेस्ट को खत्म किया गया या नहीं?

सोर्सेज: https://hindi.livelaw.in

 

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